Friday, September 3, 2010

एक सुनहरी शाम

इस धुंध में भी एक चेहरे की
मधुर मुस्कान बाकी है।
यादों के पुरिंदे में अब तक
एक सुनहरी शाम बाकी है।
बीत गया हर लम्हा
खत्म हो गया ये साल
लेकिन अभी भी कुछ यादें बाकी है।

एक साथी सफर का
अब तक याद है मुझे।
उस अजनबी रिश्ते का
अब तक अहसास है मुझे।
खुशियाँ इतनी मिली कि
झोली मेरी मुस्कुराहटों से भर गई।‍
जिंदगी में सब कुछ मिला मुझे
पर तेरी कमी खल गई।

इस साथी को 'अलविदा' कहना
खुशियों से जुदा होना था,
अपनों से खफा होना था।
परंतु वो रहेगा कायम हमेशा
मेरे होठों की मुस्कान में,
इन आँखों की तलाश में,
मेरी लेखनी के शब्दों में .....

Saturday, May 15, 2010

मेरी माँ

ब्रह्मा यद्यपि सृष्टि रचयिता, उससे, बढ़ कर मेरी माँ
सृष्टा के आसन पर बैठी, मुझको घढ़कर मेरी माँ
बेटे की माँ बन जाने का, गौरव तुमने पाया था
हुई घोषणा थाल बजाते, छत पर छढ़कर मेरी माँ
मैं तो तिर्यक योनी में, घुटनों के बल चलता था
गिरते को हर बार उठती, हाथ पकरकर मेरी माँ
अमृत सा पय पण कराती, आँचल की रख ओट मुझे
बड़ा हुआ तो खूब खिलाती, हरदम लड़कर मेरी माँ
किये उपद्रव तोडा फोड़ी,उपालम्ब भी खूब सहे
किन्तु नहीं अभिशापित करती, कभी बिगड़कर मेरी माँ
लगती तुम ममता की सरिता, मंथर गति से जो बहती
कभी बनी पाषाण शिला सम, आगे अड़कर मेरी माँ
तुम मेरी पैगेम्बर जननी, तुम ही पीर ओलिया हो
शत शत शत प्रणाम अर्पित है, चरणों पड़ कर मेरी माँ

इतना दूर चला हूँ , फिर भी मंजिल नहीं मिली

केवल दिखलाने को सारे, कात रहे तकली
मुस्काने जो मिलीं हजारों, ज्यादातर नकली
घुप्प अँधेरा था पर, कोइ शम्मा नहीं जली
इतना दूर चला हूँ , फिर भी मंजिल नहीं मिली
सपनो की बन्दनवारों ने, मंगलाचरण किया

धूप खिली तो मृगत्रशना ने, सब कुछ हरण किया
आदर्शों की जुजबन्दी से, पोथी गयी सिली
इतना दूर चला हूँ , फिर भी मंजिल नहीं मिली
बियाबान में थकन उदासी, ओर बिछावन घास
लेकिन विधना संग मैं मेरे, इसका था आभास
मेली चादर फटी हुई सी, वो भी नहीं सिली
इतना दूर चला हूँ, फिर भी मंजिल नहीं मिली

अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर, ढूँढ रहे थे नैन
जिन बिरवों के नीचे बैठा, वो खुद थे बैचेन
कथनी करनी के अंतर मैं,मन की नहीं चली
इतना दूर चला हूँ , फिर भी मंजिल नहीं मिली

कहा पवन के इक झोकें ने, भर मेरी बाहें
पगडंडी को छोड़ बावले , निर्मित कर राहें
विश्वासों की चट्टानों से राह नई निकली
इतना दूर चला हूँ, फिर भी मंजिल नहीं मिली

केवल दिखलाने को सारे, कात रहे तकली
मुस्काने जो मिलीं हजारों, ज्यादातर नकली
घुप्प अँधेरा था पर, कोइ शम्मा नहीं जली
इतना दूर चला हूँ , फिर भी मंजिल नहीं मिली

किशोर पारीक"किशोर"

बबुआ ! कन्या हो या वोट

भारतीय संस्कृति में दान को बड़े विराट अर्थॊं में स्वीकारा गया है। कन्यादान और मतदान दोनों में अनेक समानताएं हैं। कन्यादान का दायरा सीमित होता है वहीं मतदान के दायरे में सारा देश आ जाता है । कन्यादान एक मांगलिक उत्सव है.मतदान उससे भी बड़ा मांगलिक उत्सव है। कन्यादान करना एक उत्तरदायित्व है...मतदान करना बड़ा उत्तरदायित्व है। कन्यादान का उत्तरदायित्व पूर्ण हो जाने पर मनको अपार शान्ति मिलती है। मतदान के उत्तरदायित्व पूर्ण हो जाने पर भी आप अमन-शान्ति चाहते हैं। कन्यादान के लिए लोग दर-दर भटक कर योग्य वर की तलाश करते हैं परन्तु मतदान के लिए क्या शीलवान (ईमानदार) पात्र की तलाश करते हैं...? यह एक बड़ा प्रश्न है इसका उत्तर आप अपने सीने में टटोलिए अथवा इस लोकगीत में खोजिए!


बबुआ ! कन्या हो या वोट ।
दोनों की गति एक है बबुआ ! दोनों गिरे कचोट ।।
õ
कन्या वरै सो पति कहलावै, वोट वरै सो नेता,
ये अपने ससुरे को दुहते, वो जनता को चोट ।।
õ
ये ढूंढें सुन्दर घर - बेटी, वे ताकें मतपेटी,
ये भी अपनी गोट फसावै, वो भी अपनी गोट ।।
õ
ये सेज भी बिछावै अपनी, वो भी सेज बिछावै,
इतै बिछै नित कथरी-गुदड़ी उतै बिछै नित नोट ।।
õ
कन्यादानी हर दिन रोवे, मतदानी भी रोवे,
वर में हों जो भरे कुलक्षण, नेता में हों खोट ।।
õ
कन्या हेतु भला वर ढूंढो, वोट हेतु भल नेता,
करना पड़े मगज में चाहे जितना घोटमघोट ।।

Monday, January 11, 2010

भूख

भूख, जो हर इन्सान के अंदर होती है
किसी को तख्तो-ताज की भूख है
तो किसी को दौलत की
किसी को भगवान बनने की भूख है
तो किसी को शैतान बनने की
किसी को औरत के जिस्म की भूख है
तो किसी को उसे मिटाने की
हर व्यक्ति अपनी भूख से घिरा,
अधमरा, बेजान सा,
जिए जा रहा है
पता नहीं क्यों;
किसके लिए?
शायद अपनी भूख को शांत करने के लिए
बिना सोचे-समझे,
बेमकसद,
केवल जिंदा है
अपनी भूख को मिटाने के लिए!!!

Friday, November 20, 2009

माँ

माँ केवल माँ नही होती
वह होती है शिक्षक
रोटी बेलते बेलते केवल अक्षर और अंक ही नही
और भी बहुत कुछ पढाती है
यह करो वह नही, कहते कहते संस्कारित करती है
दंड भी देती है कई बार कठोर
हमारी हर गतिविधि पर होती है उसकी पैनी नजर
और हमारी सुरक्षा सर्वोपरि
माँ केवल माँ नही होती
वह होती है रक्षक
सिखाती है इस दुनिया में रहने और जीने के तरीके
दुनिया में हमेशा धोका समझ कर चलो
भरोसा मत करो जाने पहचाने का भी,
अनजान का तो बिलकुल भी नही
य़हाँ वहाँ अकेले बिना जरूरत न जाना
कितनी बुरी लगती थी तब उसकी यह टोका टाकी
अब पता चलता है कितनी सही थी माँ
माँ केवल माँ नही होती
वह होती है परीक्षक
उसकी सिखाई बातों को हमने कितना आत्मसात किया
यह जाने बिना उसे चैन कहाँ
हलवा बनाओ, बर्तन चमकाओ
सवाल करो,जवाब तलाशो, कविता सुनाओ
हजार चीजें ।
माँ होती है परिचारिका भी
और कभी कभी डॉक्टर
बुखार में कभी भी आँख खुले माँ हमेशा सिरहाने
माथे पर पट्टियाँ रखते हुए
छोटे मोटे बुखार, सर्दी जुकाम तो वह
अपने अद्रक वाली बर्फी या काढे से ही ठीक कर देती
तब माँ कितनी अच्छी लगती
आज जब सिर्फ उसकी याद ही बाकी है
उसकी महत्ता समझ आ रही है ।
तुम सुन रही हो न माँ ?

माँ से साभार

मैं और मेरी क़िताबें अक‍सर ये बातें करते हैं

मैं और मेरी किताबें अकसर ये बातें करते हैं- किसी की ज़ुबान से जब ये बात निकली हो, तो यकीनन बहुत गहरा अर्थ रहा होगा इसके पीछे| वो कोई भी बात 'यूं ही' तो नहीं कह देता|
और इसका अर्थ तब ज़ाहिर होना शुरु हुआ जब उससे किताबें सुनना शुरु की| जीवन में किताबें तो बहुत पढ़ी हैं, जिनको पढ़ने के बाद भी ज़हन में खयाल रह जाता था कि पता नहीं ठीक से पढ़ी या नहीं| क्योंकि कई बार हम उस जगह नहीं पहुंच पाते जहां पहुंचकर लेखक ने लिखा होता है| लेकिन किताब को यदि उसके लेखक की ज़ुबान से सुनने को मिलें तो लगता है किताब को पढ़ा नहीं जिया है|

और उसकी ज़ुबान से किसी किताब को सुनने के मायने यही है कि उसके लेखक द्वारा सुनी जा रही है| फिर चाहे वह अमृता की 'तेरहवां सूरज' हो, चाहे दुष्यंत कुमार की काव्य नाटिका 'एक कंठ विषपायी' हो या फिर बब्बा (ओशो) के कहे हुए वचन|

अमृता की 'तेरहवां सूरज' और 'उनचास दिन' सुनते हुए तो मैं खुद अमृता हो गई थी| 'तेरहवां सूरज' का दूसरा भाग है 'उनचास दिन' और उसको सुनते हुए खयाल आया था कि अब उसके तीसरे भाग को लिखने का समय आ गया है| ऐसी अनहोनी घटना तभी घट सकती है जब आप के कानों में पड़ने वाली आवाज़ लिखने वाले की ही हो तभी तो आप लेखक में इतने समाहित हो जाते हैं कि उसी की तरह सोचने लगते हैं|

कवि नीरज द्वारा लिखा श्रंगार गीत जब पढ़ा तो लगा, नहीं!!! यह मेरे तरह की कविता नहीं है, मन नहीं लगा उसको पढ़ने में, लेकिन उसी श्रंगार गीत को जब उसके मुंह से सुना तो लगा जैसे कवि नीरज ने वो गीत हमारे लिए ही लिखा है| उसका एक-एक शब्द जैसे हमारी पहली मुलाकात को वर्णित कर रहा था| कई महिनों से उसे सिर्फ़ एक आवाज़ के रुप में जानती थी, उस व्यक्ति को पहली बार साक्षात रुप में देखना किसी स्वप्न के सच हो जाने जैसा ही था| और उस पहली मुलाकात के लिए किसी कवि ने पहले से ही कोई कविता रच दी हो हमारे लिए, तो कोई अचंभा नहीं है| जो व्यक्ति किताबों से बातें करता हो वे किताबें और किताबों के रचयिता इतना तो कर ही सकते हैं उसके लिए|


और उन अद्भुत क्षणॉं को शब्दों में पिरोना तो और भी मुश्किल है मेरे लिए जब वो बब्बा(ओशो) की किताबों को सुनाता हैं| बब्बा ने कभी कुछ लिखा नहीं सिर्फ़ बोला है| वह राइटर नहीं ओरेटर है| जब किसी लेखक की लिखी हुई बातों को वो उसी अंदाज़ और अर्थों के साथ सुनाता हो तो किसी की कहीं हुई बातों को उन्हीं के अर्थों में समझाने का जादू सिर्फ़ उसी के बस का है| और वो बातें जब बब्बा द्वारा कही गई हो तो लगता है कि उनको सुनने के लिए स्वयं बब्बा भी आए हैं| उसका कारण भी है, जिस कमरे में जिस कुर्सी पर बैठ कर वो बब्बा को पढ़ता है, कई बरस पहले उसी जगह बब्बा भी बैठा करते थे| वह उनकी बैठक हुआ करती थी|


उसकी ज़ुबान से बब्बा बोल रहे हैं या बब्बा उसकी ज़ुबान से बातों को दोहरा रहे हैं या बब्बा खुद वहां आ कर खुद को सुन रहे हैं कोई नहीं जानता, कोई समझ ही नहीं सकता| ये अद्भुत क्षण, पल, समय जो गुज़रता है वो समझने के लिए नहीं अनुभव करने के लिए होता है| बब्बा को पढ़ते समय उसके शरीर के चारों ओर मुझे एक दिव्य प्रकाश दिखाई देता है| मनुष्य के आसपास बनने वाले 'ऑरा' को देखा जा सकता है लेकिन जो ऑरा, जो प्रकाशवान गोला बुद्ध्, महावीर या हमारे देवी देवताओं के सिर के पीछे हम उनके चित्रों में देखते हैं, वह प्रकाशमान दिव्य गोला मुझे उसके सिर के पीछे भी दिखाई देता है|
ब्लॉग "नायिका" से साभार

Saturday, November 14, 2009

एक दिन चुक जाएगी ही बात

बात है:
चुकती रहेगी
एक दिन चुक जाएगी ही—बात
जब चुक चले तब
उस विन्दु पर
जो मैं बचूँ
(मैं बचूँगा ही!)
उस को मैं कहूँ—
इस मोह में अब और कब तक रहूँ?

चुक रहा हूँ मैं।
स्वयं जब चुक चलूँ
तब भी बच रहे जो बात—
(बात ही तो रहेगी!)
उसी को कहूँ:
यह सम्भावना—
यह नियति—कवि की
सहूँ।
उतना भर कहूँ,:
—इतना कर सकूँ
जब तक चुकूँ!