बिहार के संसदीय चुनावों में यह शायद पहला मौका होगा जब चुनाव में सिर्फ जाति बाहुबल और गठजोड़ के अलावा भी कुछ नजर आएगा देश के अन्य प्रदेशों में बह रही और चुनावों में अपना असर दिखा चुकी विकास की बयार के झोंके यहां भी असर दिखा रहे हैं अच्छा तो यह है कि जनता भी विकास को कुछ मुद्दों से उपर मान रही है मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इसे अभी तक अपना मुद्दा मान रहे थे और उन्होंने काम-प्रचार साथ कर इसको बहस के रुप में बदलवा भी दिया लालू प्रसाद यादव भी बतौर रेलमंत्री ऐसा कुछ करने की कोशिशा कर गए कि बिहार को काफी कुछ मिला और प्रदेश में अपनी पार्टी के तीन कार्यकालों की छवि को साफ करने में लग गए प्रदेश के तीसरे बड़े नेता उर्वरक मंत्री रामविलास पासवान भी इसमें जुटे कारखाने लगाने की प्रक्रिया शुरु की और लगवाए भी पर संसदीय चुनाव में पहली बार ऐसा होगा कि जनता के सामने सिर्फ वोट बैंक का मुद्दा नहीं होगा इसे सड़क पुल एजुकेशन मकान और भयमुक्त राज्य की बातों पर भी गवाह होना पड़ रहा है ऐसा बहुत कम प्रदेशों में होगा जहां विरोधी दल भी अपने तरीके से विकास की बात कर रहा है लेकिन सबकुछ आसान नहीं होगा चुनाव जीतने के लिए जितने भी गठजोड़ किए जा सकते हैं किए जा रहे हैं प्रदेश में सत्तारुढ जद(यू)-भाजपा का गठजोड़ फेवीकोल सा है आडवाणी के मंदिर राग के बावजूद चालीस सीटों में से चौबीस और सोलह का अनुपात तक साथ मान्य है खेल तो दूसरे खेमे में है और अगर सबकुछ ठीक रहा तो सामने वाले का खेल बिगाड़ने की कुव्वत भी लालू-पासवान गठजोड़ में है लेकिन यहां दिक्कत सीटों के बंटवारे पर ही है लालू उदार नजर आ रहे हैं और पासवान कड़े फिलहाल वह सोलह पर डटे हैं कांग्रेस यहां पांच पर ही सिमटी रहेगी राष्ट्रीय जनता दल ने पिछले चुनाव में बाइस सीटें जीती थी इसलिए इससे कम पर लड़ना नहीं चाहती लालू की समस्या बाकी और साथी दलों को एडजस्ट करने की है पासवान थोड़ा हां थोड़ा ना के बाद तेरह तक आ सकते हैं लेकिन यह सच है कि समीकरण में पासवान आज यूपीए की जरुरत बन गए हैं दलित प्रधानमंत्री मायावती की कुर्सी के सामने उनकी कुर्सी रखने का काम चल रहा है पिछले लोकसभा-विधानसभा चुनाव में सीटों के हेरफेर के बावजूद जद(यू)-भाजपा का मत-प्रतिशत घटा-बढा नहीं पर लोकसभा से विधानसभा आते-आते लालू की पार्टी का सात प्रतिशत मत घटा और पासवान की पार्टी लोजपा का भी वोट बैंक तीन प्रतिशत बढ़ गया लेकिन दिक्कत यह है कि जद(यू)-भाजपा के साथ कोई और आने को तैयार नहीं और राजद-लोजपा कैसे पुराने साथियों को जोड़ेंगे यह बड़ा सवाल होगा प्रदेश के सोलह फीसदी मुसलमानों के एकमुश्त जाने की संभावनाएं अब भी लालू को कितना उत्साहित करेंगी यह भी वक्त तय करेगा लेकिन यह तय है कि इस बार चुनावी पंडितों के वोट प्रतिशत की जड़ता विकास के पुर्जे कुछ तोड़ेंगे जरुर
अकु श्रीवास्तव (हमलोग से साभार)
Tuesday, March 3, 2009
Friday, February 27, 2009
......काल्पनिक नहीं है राधा
भगवान श्रीकृष्ण की शाश्वत शक्ति स्वरूपा राधा अथवा राधिका को काल्पनिक निरूपित करने की अवधारणा के प्रतिपादकों में ऐसी भ्रांति है कि राधा नाम तो केवल कविताओं में है। हिंदी के भक्तिकालीन कवियों ने राधाकृष्ण पर एक से बढ़ कर एक उत्कृष्ट कविता लिखी है, जो हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर है। मगर इन कविताओं को सराहने वाले भी उक्त अवधारणा के प्रभाव में आकर राधा को काल्पनिक चरित्र ही मान बैठते हैं। इस अवधारणा के विरोध में पहला तर्क तो यही है कि इतने सारे कृष्णभक्त कवि, जिनमें सूरदास, मीराबाई, बिहारीलाल तथा रसखान प्रमुख हैं। एक ही साझे काल्पनिक चरित्र पर इतनी सारी कविताएं क्यों लिखते!
दरअसल, इस अवधारणा का आधार है:- श्रीकृष्ण के जीवन चरित से संबंधित प्राचीन प्रामाणिक ग्रंथ श्रीमद्भागवत महापुराण में राधा नाम का उल्लेख नहीं होना। किंवदंती है कि राधाजी ने श्रीमद्भागवत महापुराण के समकालीन रचनाकार महर्षि वेदव्यास से अनुरोध किया था कि वह इस ग्रंथ में उनका नामोल्लेख कहीं न करें और यह पूरी तरह से श्रीकृष्ण को समर्पित हो। इससे भी बड़ी बात यह है कि हमारा प्राचीन ज्ञान ज्यादातर गुरु-शिष्य परंपरा से श्रुति-स्मृति पद्धति से आगे बढ़ता रहा है। पुस्तकें तो बहुत बाद में आई। पहले तो श्रुति-स्मृति पद्धति ही ज्ञानांतरण की एक मात्र विधा थी। संचार क्रांति के वर्तमान कंप्यूटर युग में भी यह परंपरा सीमित आयाम में ही सही, बदस्तूर जारी है। विभिन्न गुरु-शिष्य समूहों के सुनने तथा उसे याद करने के बीच जो अंतर रह जाता है, उसके भी दृष्टांत हैं। कई प्राचीन ग्रंथों के विभिन्न संस्करणों में पाठांतर होना यही दर्शाता है। अनेक प्राचीन वास्तविक घटनाएं प्रसंग आज भी श्रुति-स्मृति विधा में ही जीवित है।
धार्मिक कथाओं में राधाजी के साथ ही उनकी आठ सखियों का भी उल्लेख आता है। इनके नाम है-ललिता, विशाखा, चित्रा, इंदुलेखा, चंपकलता, रंगदेवी, तुंगविद्या और सुदेवी। वृंदावन में इन सखियों को समर्पित प्रसिद्ध अष्टसखी मंदिर भी है। जब सखियां हैं तो राधाजी भी अवश्य होंगी, इसलिए यह सब मात्र कल्पना बिल्कुल नहीं हो सकता। भागवत में राधा नाम का प्रत्यक्ष उल्लेख भले ही न हो लेकिन परोक्ष रूप से जगह-जगह राधा नाम छुपा हुआ है। राधा नाम कम से कम एक भागवेत्तर प्राचीन रचना में अवश्य है। जिस प्रकार विभिन्न देवी-देवताओं के कवच पाठ होते हैं, उसी प्रकार राधाजी का भी कवच उपलब्ध है। यह कवच प्राचीन श्रीनारदपंचरात्र में है, जो यह सिद्ध करता है कि राधानाम भक्तिकालीन कवियों से बहुत पहले भी था।
दक्षिण के संत श्री विल्बमंगलाचार्य ने तो श्री गोविंददामोदर स्रोत जैसी राधाकृष्ण आराधना की उत्कृष्ट रचना में कई जगह राधा नाम का उल्लेख किया है। वृंदावन में रासलीला करते हुए जब भगवान अचानक अंतध्र्यान हो गए तो गोपियां व्याकुल होकर उन्हें खोजने लगीं। मार्ग में उन्हें श्रीकृष्ण के साथ ही एक ब्रजबाला के भी पदचिह्न दिखाई दिए। भागवत में कहा गया है-
अनया आराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वर:।
यन्नो विहाय गोविंद: प्रीतोयामनयद्रह:।।
अर्थात गोपियां आपस में कहती हैं- अवश्य ही सर्व शक्तिमान भगवान श्रीकृष्ण की यह आराधिका होगी, इसीलिए इस पर प्रसन्न होकर हमारे प्राणप्यारे श्यामसुंदर ने हमें छोड़ दिया है और इसे एकांत में ले गए हैं।
जाहिर है कि यह गोपी और कोई और नहीं बल्कि राधा ही थी। श्लोक के आराधितो शब्द में राधा का नाम भी छुपा हुआ है।
श्री नारदपंचरात्र में शिव-पार्वती संवाद के रूप में प्रस्तुत श्री राधा कवचम् के प्रारंभ में श्री राधिकायै नम: लिखा हुआ है। पहले श्लोक में देवी पार्वती भगवान शंकर से अनुरोध करती है:-
कैलास वासिन् भगवान् भक्तानुग्रहकारक। राधिका कवचं पुण्यं कथयस्व मम प्रभो।।
अर्थात हे कैलासवासी, भक्तों पर अनुग्रह करने वाले हे प्रभो, श्री राधिका जी का पवित्र कवच मुझे सुनाइए।
वैसे श्रीमद् भागवत महापुराण के प्रारंभ में श्री राधाकृष्णाभ्यां नम: दिया गया है। अब प्रश्न यह पैदा होता है कि व्यासजी ने राधा जी के अनुरोध का उल्लंघन करके वहां उनका नाम कैसे दे दिया।
इस संदर्भ में वृंदावन के श्री राधा वल्लभ मंदिर के आचार्य श्रीहित मोहित मराल गोस्वामी युवराज ने तर्क दिया कि व्यासजी ने राधा जी की शर्त कहीं नहीं तोड़ी है और ग्रंथ में सभी जगह उन्होंने राधा शब्द को परोक्ष रूप में ही दिया है। गोस्वामी ने कहा कि मूलत: तो ग्रंथ के प्रारंभ में केवल कृष्णाभयां नम: लिखा गया था और यह मान लिया गया था कि कृष्ण के नाम से पहले राधा का नाम छुपा हुआ है।
चूंकि व्याकरण की दृष्टि से कृष्णाभ्यां सही नहीं था, अत: बाद के संस्करणों में राधाकृष्णाभ्यां कर दिया गया। चतुर्थ विभक्ति द्विवचन अकेले कृष्ण के लिए प्रयुक्त नहीं हो सकता था।
व्याकरणाचार्य यह भूल गए कि ब्यास जी तो उसमें राधा नाम को छुपाए बैठे हैं, जिसका प्रकटत: उल्ल्ेाख करना राधाजी की शर्त का उल्लंघन होता। छुपे राधा शब्द को मिला कर तो द्विवचन बन ही जाता है। प्रसंगवश महान अंग्रेजी क वि नाटककार विलियम शेक्सपियर ने एक जगह दि मोस्ट अनकाइंडेस्ट-अधिकतम क्रूरतम विशेषण का प्रयोग किया है, जो व्याकरण की दृष्टि से गलत है। यहां क्रूरता की अधिकता दर्शाने के लिए जान बूझकर यह प्रयोग किया गया है।
व्यासजी और शेक्सपियर के लेखन में संशोधन की गुंजाइश कहां है। भागवत में महारास के प्रसंग का यह श्लोक भी विचारणीय है:-
तत्रारभत गोविंदो रासक्रीड़ामनुव्रतै ।
स्त्रीरत्नैरन्वित: प्रीतैरन्योन्याबद्ध बाहुभि:।।
अर्थात भगवान श्रीकृष्ण की प्रेयसी और सेविका गोपियां एक दूसरे की बांह में बांह डाले खड़ी थीं। उन स्त्री रत्नों के साथ यमुना जी के पुलिन पर भगवान ने अपनी रसमर्या रासक्रीड़ा प्रारंभ की। स्पष्ट है कि सामान्य गोपियों से पृथक एक गोपी भगवान की प्रेयसी थी। वह राधाजी के अलावा और कौन हो सकती है।
यह प्रसिद्ध है कि राधा जी के पिता गोप प्रमुख वृषभानु थे और वह वृंदावन के निकट बरसाना के रहने वाले थे। संभव है कि श्री नारदपंचरात्र राधाकृष्ण के समय से पहले की रचना हो। तब प्रश्न यह पैदा होगा कि किसी के जन्म से पहले उसके नाम का उल्लेख कैसे हो सकता है। इसे समझने के लिए गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरित मानस का सहारा लेना होगा।
गोस्वामी जी इस महाकाव्य में शिव-पार्वती विवाह के अवसर पर गणेश वंदना का उल्लेख करते हैं:-
मुनि अनुसासन गनपतिहि पूजेउ संभु भवानि।
कोउ सुनि संसय करै जनि सुर अनादि जिय जानि।।
अर्थात् मुनियों की आज्ञा से शिवजी और पार्वती जी ने गणेशजी का पूजन किया। देवताओं को अनादि समझते हुए कोई यह शंका न करें कि गणेश जी तो शिव-पार्वती पुत्र है, इसलिए उनके विवाह से पहले ही गणेश जी का अस्तित्व कैसे हो सकता है। इसी तरह राधाजी भी अनादि सनातन तथा शाश्वत है। वृषभानु कुमारी के रूप में उनके अवतरण से बहुत पहले अनुराधा नक्षत्र का नामकरण भी शायद उन्हीं के नाम पर हो चुका था।
संत श्री विल्बमंगलाचार्य हिंदी के भक्तिकालीन कवियों के समकालीन जरूर थे, लेकिन यह मानने का कोई आधार नहीं है कि उन्होंने इन कवियों से प्रेरणा लेकर राधा नाम का उल्लेख किया था। ऐसे कई प्रमाण हैं, जो सिद्ध करते हैं कि राधा रानी कोई काल्पनिक चरित्र नहीं बल्कि श्रीकृष्ण की शाश्वत शक्तिस्वरूपा और आल्हादिनी शक्ति हैं
पहाड़ी बाबा से साभार
दरअसल, इस अवधारणा का आधार है:- श्रीकृष्ण के जीवन चरित से संबंधित प्राचीन प्रामाणिक ग्रंथ श्रीमद्भागवत महापुराण में राधा नाम का उल्लेख नहीं होना। किंवदंती है कि राधाजी ने श्रीमद्भागवत महापुराण के समकालीन रचनाकार महर्षि वेदव्यास से अनुरोध किया था कि वह इस ग्रंथ में उनका नामोल्लेख कहीं न करें और यह पूरी तरह से श्रीकृष्ण को समर्पित हो। इससे भी बड़ी बात यह है कि हमारा प्राचीन ज्ञान ज्यादातर गुरु-शिष्य परंपरा से श्रुति-स्मृति पद्धति से आगे बढ़ता रहा है। पुस्तकें तो बहुत बाद में आई। पहले तो श्रुति-स्मृति पद्धति ही ज्ञानांतरण की एक मात्र विधा थी। संचार क्रांति के वर्तमान कंप्यूटर युग में भी यह परंपरा सीमित आयाम में ही सही, बदस्तूर जारी है। विभिन्न गुरु-शिष्य समूहों के सुनने तथा उसे याद करने के बीच जो अंतर रह जाता है, उसके भी दृष्टांत हैं। कई प्राचीन ग्रंथों के विभिन्न संस्करणों में पाठांतर होना यही दर्शाता है। अनेक प्राचीन वास्तविक घटनाएं प्रसंग आज भी श्रुति-स्मृति विधा में ही जीवित है।
धार्मिक कथाओं में राधाजी के साथ ही उनकी आठ सखियों का भी उल्लेख आता है। इनके नाम है-ललिता, विशाखा, चित्रा, इंदुलेखा, चंपकलता, रंगदेवी, तुंगविद्या और सुदेवी। वृंदावन में इन सखियों को समर्पित प्रसिद्ध अष्टसखी मंदिर भी है। जब सखियां हैं तो राधाजी भी अवश्य होंगी, इसलिए यह सब मात्र कल्पना बिल्कुल नहीं हो सकता। भागवत में राधा नाम का प्रत्यक्ष उल्लेख भले ही न हो लेकिन परोक्ष रूप से जगह-जगह राधा नाम छुपा हुआ है। राधा नाम कम से कम एक भागवेत्तर प्राचीन रचना में अवश्य है। जिस प्रकार विभिन्न देवी-देवताओं के कवच पाठ होते हैं, उसी प्रकार राधाजी का भी कवच उपलब्ध है। यह कवच प्राचीन श्रीनारदपंचरात्र में है, जो यह सिद्ध करता है कि राधानाम भक्तिकालीन कवियों से बहुत पहले भी था।
दक्षिण के संत श्री विल्बमंगलाचार्य ने तो श्री गोविंददामोदर स्रोत जैसी राधाकृष्ण आराधना की उत्कृष्ट रचना में कई जगह राधा नाम का उल्लेख किया है। वृंदावन में रासलीला करते हुए जब भगवान अचानक अंतध्र्यान हो गए तो गोपियां व्याकुल होकर उन्हें खोजने लगीं। मार्ग में उन्हें श्रीकृष्ण के साथ ही एक ब्रजबाला के भी पदचिह्न दिखाई दिए। भागवत में कहा गया है-
अनया आराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वर:।
यन्नो विहाय गोविंद: प्रीतोयामनयद्रह:।।
अर्थात गोपियां आपस में कहती हैं- अवश्य ही सर्व शक्तिमान भगवान श्रीकृष्ण की यह आराधिका होगी, इसीलिए इस पर प्रसन्न होकर हमारे प्राणप्यारे श्यामसुंदर ने हमें छोड़ दिया है और इसे एकांत में ले गए हैं।
जाहिर है कि यह गोपी और कोई और नहीं बल्कि राधा ही थी। श्लोक के आराधितो शब्द में राधा का नाम भी छुपा हुआ है।
श्री नारदपंचरात्र में शिव-पार्वती संवाद के रूप में प्रस्तुत श्री राधा कवचम् के प्रारंभ में श्री राधिकायै नम: लिखा हुआ है। पहले श्लोक में देवी पार्वती भगवान शंकर से अनुरोध करती है:-
कैलास वासिन् भगवान् भक्तानुग्रहकारक। राधिका कवचं पुण्यं कथयस्व मम प्रभो।।
अर्थात हे कैलासवासी, भक्तों पर अनुग्रह करने वाले हे प्रभो, श्री राधिका जी का पवित्र कवच मुझे सुनाइए।
वैसे श्रीमद् भागवत महापुराण के प्रारंभ में श्री राधाकृष्णाभ्यां नम: दिया गया है। अब प्रश्न यह पैदा होता है कि व्यासजी ने राधा जी के अनुरोध का उल्लंघन करके वहां उनका नाम कैसे दे दिया।
इस संदर्भ में वृंदावन के श्री राधा वल्लभ मंदिर के आचार्य श्रीहित मोहित मराल गोस्वामी युवराज ने तर्क दिया कि व्यासजी ने राधा जी की शर्त कहीं नहीं तोड़ी है और ग्रंथ में सभी जगह उन्होंने राधा शब्द को परोक्ष रूप में ही दिया है। गोस्वामी ने कहा कि मूलत: तो ग्रंथ के प्रारंभ में केवल कृष्णाभयां नम: लिखा गया था और यह मान लिया गया था कि कृष्ण के नाम से पहले राधा का नाम छुपा हुआ है।
चूंकि व्याकरण की दृष्टि से कृष्णाभ्यां सही नहीं था, अत: बाद के संस्करणों में राधाकृष्णाभ्यां कर दिया गया। चतुर्थ विभक्ति द्विवचन अकेले कृष्ण के लिए प्रयुक्त नहीं हो सकता था।
व्याकरणाचार्य यह भूल गए कि ब्यास जी तो उसमें राधा नाम को छुपाए बैठे हैं, जिसका प्रकटत: उल्ल्ेाख करना राधाजी की शर्त का उल्लंघन होता। छुपे राधा शब्द को मिला कर तो द्विवचन बन ही जाता है। प्रसंगवश महान अंग्रेजी क वि नाटककार विलियम शेक्सपियर ने एक जगह दि मोस्ट अनकाइंडेस्ट-अधिकतम क्रूरतम विशेषण का प्रयोग किया है, जो व्याकरण की दृष्टि से गलत है। यहां क्रूरता की अधिकता दर्शाने के लिए जान बूझकर यह प्रयोग किया गया है।
व्यासजी और शेक्सपियर के लेखन में संशोधन की गुंजाइश कहां है। भागवत में महारास के प्रसंग का यह श्लोक भी विचारणीय है:-
तत्रारभत गोविंदो रासक्रीड़ामनुव्रतै ।
स्त्रीरत्नैरन्वित: प्रीतैरन्योन्याबद्ध बाहुभि:।।
अर्थात भगवान श्रीकृष्ण की प्रेयसी और सेविका गोपियां एक दूसरे की बांह में बांह डाले खड़ी थीं। उन स्त्री रत्नों के साथ यमुना जी के पुलिन पर भगवान ने अपनी रसमर्या रासक्रीड़ा प्रारंभ की। स्पष्ट है कि सामान्य गोपियों से पृथक एक गोपी भगवान की प्रेयसी थी। वह राधाजी के अलावा और कौन हो सकती है।
यह प्रसिद्ध है कि राधा जी के पिता गोप प्रमुख वृषभानु थे और वह वृंदावन के निकट बरसाना के रहने वाले थे। संभव है कि श्री नारदपंचरात्र राधाकृष्ण के समय से पहले की रचना हो। तब प्रश्न यह पैदा होगा कि किसी के जन्म से पहले उसके नाम का उल्लेख कैसे हो सकता है। इसे समझने के लिए गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरित मानस का सहारा लेना होगा।
गोस्वामी जी इस महाकाव्य में शिव-पार्वती विवाह के अवसर पर गणेश वंदना का उल्लेख करते हैं:-
मुनि अनुसासन गनपतिहि पूजेउ संभु भवानि।
कोउ सुनि संसय करै जनि सुर अनादि जिय जानि।।
अर्थात् मुनियों की आज्ञा से शिवजी और पार्वती जी ने गणेशजी का पूजन किया। देवताओं को अनादि समझते हुए कोई यह शंका न करें कि गणेश जी तो शिव-पार्वती पुत्र है, इसलिए उनके विवाह से पहले ही गणेश जी का अस्तित्व कैसे हो सकता है। इसी तरह राधाजी भी अनादि सनातन तथा शाश्वत है। वृषभानु कुमारी के रूप में उनके अवतरण से बहुत पहले अनुराधा नक्षत्र का नामकरण भी शायद उन्हीं के नाम पर हो चुका था।
संत श्री विल्बमंगलाचार्य हिंदी के भक्तिकालीन कवियों के समकालीन जरूर थे, लेकिन यह मानने का कोई आधार नहीं है कि उन्होंने इन कवियों से प्रेरणा लेकर राधा नाम का उल्लेख किया था। ऐसे कई प्रमाण हैं, जो सिद्ध करते हैं कि राधा रानी कोई काल्पनिक चरित्र नहीं बल्कि श्रीकृष्ण की शाश्वत शक्तिस्वरूपा और आल्हादिनी शक्ति हैं
पहाड़ी बाबा से साभार
पर माँ कभी बीमार नही होती
क्या पता सोती भी है या नही,
जब मैं सोता,
वह जगी होती,
जब मैं जगता,
वहझाडू - पानी -सफाई कर,
फूंकनी ले,
चुल्हे के पडौस में बैठी होती,
कभी घट्टी पर,
कभी गौशाला में,
गुदडियों को सुई चुभोती,
ढिबरी में तेल भरउजाला करती,
दिन भर कुछ ना कुछ करती ही रहती,
मुझे बुखार आता,
दद्दू खटियां पर पडे रहते,
बाबा खांसते- खांसते दुहरा जाते....पर,
पर माँ कभी बीमार नही होती फ़िर भी.........फिर भी ना जाने जल्दी .....मर क्यूं जाती है ?
जब मैं सोता,
वह जगी होती,
जब मैं जगता,
वहझाडू - पानी -सफाई कर,
फूंकनी ले,
चुल्हे के पडौस में बैठी होती,
कभी घट्टी पर,
कभी गौशाला में,
गुदडियों को सुई चुभोती,
ढिबरी में तेल भरउजाला करती,
दिन भर कुछ ना कुछ करती ही रहती,
मुझे बुखार आता,
दद्दू खटियां पर पडे रहते,
बाबा खांसते- खांसते दुहरा जाते....पर,
पर माँ कभी बीमार नही होती फ़िर भी.........फिर भी ना जाने जल्दी .....मर क्यूं जाती है ?
Monday, September 22, 2008
भारत में सक्रिय आतंकवादी संगठन
भारत में उग्रवादी संगठनों की सूची दिनोदिन बढ़ती ही जा रही है। आए दिन होने वाली आतंकवादी वारदातों में किसी नए संगठन का नाम सामने आता है, या फिर कोई नया संगठन हमले की जिम्मेदारी लेता है। जयपुर में हुए बम विस्फोटों की जिम्मेदारी इंडियन मुजाहिदीन ने ली है, हाँलाकि सुरक्षा एजेंसियों को इस दावे पर पूरा भरोसा नहीं है।
यह अल्पज्ञात आतंकी संगठन पहले भी कुछ वारदातों की जिम्मेदारी ले चुका है। केंद्रीय गृह मंत्रालय राज्य सरकारों की पुलिस और खुफिया तंत्र से मिली जानकारी के आधार पर इन उग्रवादी और पृथकतावादी संगठनों पर नजर रखता है और इनके खिलाफ सतत कार्रवाई चलती रहती है।
केंद्र सरकार विधि विरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम 2004 के तहत 32 गिरोहों को आतंकवादी संगठन के रूप में प्रतिबंधित कर चुकी है।
प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन
* बब्बर खालसा इंटरनेशनल
* खालिस्तान कमांडो फोर्स
* खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स
* इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन
* लश्कर-ए-तोइबा/पासवान-ए-अहले हदीस
* जैश-ए-मोहम्मद/तहरीक-ए-फुरकान
*हरकत-उल- मुजाहिनद्दीन- हरकत-उल- जेहाद-ए-इस्लामी
* हिज्ब-उल-मुजाहिद्दीनर, पीर पंजाब रेजीमेंट
* अल-उमर-इस्लामिक फ्रंट
* यूनाइटेड लिब्रेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा)
* नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट बोडोलेंड (एनडीएफबी)
* पीपल्स लिब्रेशन आमी (पीएलए)
* यूनाइटेड नेशनल लिब्रेशन फ्रंट (यहव, एनएलएफ)
* पीपल्स रिवोल्यूशनरी पार्टी ऑफ कांग्लेईपाक (पीआरईपीएके)
* कांग्लेईपाक कम्युनिस्ट पार्टी (केसीपी)
* कैंग्लई याओल कन्चालुम (केवाईकेएल)
* मणिपुर पीपल्स लिब्रेशन फ्रंट (एमपीएलफ)
* आल त्रिपुरा टाइगर फोर्स
* नेशनल लिब्रेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा
* लिब्रेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (एलटीटीई)
* स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया
* दीनदार अंजुमन
*कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) पीपल्स वार, इसके सभी फार्मेशन और प्रमुख संगठन।
* माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) इसके सभी फार्मेशन और प्रमुख संगठन।
* अल बदर
* जमायत-उल-मुजाहिद्दीन
* अल-कायदा
* दुखतरान-ए-मिल्लत (डीईएम)
* तमिलनाडु लिबरेशन आर्मी (टीएनएलए)
* तमिल नेशनल रिट्रीवॅल टुप्स (टीएनआरटी)
* अखिल भारत नेपाली एकता समाज (एबीएनईएस)
यह अल्पज्ञात आतंकी संगठन पहले भी कुछ वारदातों की जिम्मेदारी ले चुका है। केंद्रीय गृह मंत्रालय राज्य सरकारों की पुलिस और खुफिया तंत्र से मिली जानकारी के आधार पर इन उग्रवादी और पृथकतावादी संगठनों पर नजर रखता है और इनके खिलाफ सतत कार्रवाई चलती रहती है।
केंद्र सरकार विधि विरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम 2004 के तहत 32 गिरोहों को आतंकवादी संगठन के रूप में प्रतिबंधित कर चुकी है।
प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन
* बब्बर खालसा इंटरनेशनल
* खालिस्तान कमांडो फोर्स
* खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स
* इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन
* लश्कर-ए-तोइबा/पासवान-ए-अहले हदीस
* जैश-ए-मोहम्मद/तहरीक-ए-फुरकान
*हरकत-उल- मुजाहिनद्दीन- हरकत-उल- जेहाद-ए-इस्लामी
* हिज्ब-उल-मुजाहिद्दीनर, पीर पंजाब रेजीमेंट
* अल-उमर-इस्लामिक फ्रंट
* यूनाइटेड लिब्रेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा)
* नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट बोडोलेंड (एनडीएफबी)
* पीपल्स लिब्रेशन आमी (पीएलए)
* यूनाइटेड नेशनल लिब्रेशन फ्रंट (यहव, एनएलएफ)
* पीपल्स रिवोल्यूशनरी पार्टी ऑफ कांग्लेईपाक (पीआरईपीएके)
* कांग्लेईपाक कम्युनिस्ट पार्टी (केसीपी)
* कैंग्लई याओल कन्चालुम (केवाईकेएल)
* मणिपुर पीपल्स लिब्रेशन फ्रंट (एमपीएलफ)
* आल त्रिपुरा टाइगर फोर्स
* नेशनल लिब्रेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा
* लिब्रेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (एलटीटीई)
* स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया
* दीनदार अंजुमन
*कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) पीपल्स वार, इसके सभी फार्मेशन और प्रमुख संगठन।
* माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) इसके सभी फार्मेशन और प्रमुख संगठन।
* अल बदर
* जमायत-उल-मुजाहिद्दीन
* अल-कायदा
* दुखतरान-ए-मिल्लत (डीईएम)
* तमिलनाडु लिबरेशन आर्मी (टीएनएलए)
* तमिल नेशनल रिट्रीवॅल टुप्स (टीएनआरटी)
* अखिल भारत नेपाली एकता समाज (एबीएनईएस)
चंद्रमा पर उपग्रह भेजना उचित है?
देश में चारों तरफ खुशहाली फैली है, लहलहाती फसलों से किसानों की चाँदी हो रही है, आतंकवाद का नामोनिशां नहीं है, देश की आर्थिक स्थिति दिन-ब-दिन मजबूत होती जा रही है...ऐसे हालातों के बीच अगर 386 करोड़ रुपए खर्च कर चंद्रमा पर चंद्रयान भेजा जाए तो बात समझ में आती है, लेकिन क्या हमारे देश के हालात ऐसे हैं? नहीं। फिर क्या ऐसे समय में चंद्रमा पर उपग्रह भेजना उचित है?
जरूरी है, मगर... : माना कि देश के विकास में अंतरिक्ष यान प्रक्षेपण का भी बड़ा हाथ होता है। इससे जाहिर होता है कि देश तकनीक के मामले में भी दूसरे देशों की बराबरी कर रहा है।
इसरो ने कल चंद्रयान-1 के दीदार देश को कराए। इसरो इस पर लंबे समय से काम कर रहा था और यह उसकी महती योजना का हिस्सा था। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जब पहली बार इस योजना का खुलासा किया था, तब विश्व बिरादरी को भरोसा नहीं था कि भारत ऐसा कर पाएगा, लेकिन आखिर हम उस मुकाम पर पहुँच ही गए, जहाँ से देश अपना पहला चंद्रयान भेजेगा।
पीएसएलवी (पोलर सैटेलाइट लॉन्च वीइकल) चंद्रयान को लेकर अंतरिक्ष की उड़ान भरेगा। इसकी तिथि तय नहीं की गई है, लेकिन 22 से 26 अक्टूबर के बीच इसे छोड़ा जाएगा।
आधुनिकता की मिसाल : चंद्रमा के बारे में जानकारियाँ जुटाने के लिए चंद्रयान में उच्च तकनीक वाले यंत्र मौजूद हैं। इसके प्रक्षेपण के उद्देश्यों के बारे में जानकारी देते हुए इसरो के सैटेलाइट केंद्र के निदेशक डॉ. टीके एलेक्स ने बताया कि यह चंद्रमा के बनने की प्रक्रिया के बारे अहम जानकारी भेजेगा।
इसके माध्यम से चंद्रमा की सतह पर प्रयोग भी किए जाएँगे। यह दो साल के दौरान चाँद की सतह का पूरा नक्शा भेजेगा।
परीक्षण अभी बाकी : बहरहाल, चंद्रयान को अभी-भी कुछ अहम परीक्षणों से गुजरना है। बेंगलुरु में यह जाँच की जाएगी। सफल रहने पर ही इसका प्रक्षेपण घोषित तिथि को हो सकेगा, वरना 5 महीने देरी से पूरी हुई यह योजना कुछ और समय ले सकती है।
इसरो के वैज्ञानिकों ने बताया है कि कम्पन और ध्वनि को लेकर चंद्रयान के अहम टेस्ट अभी बाकी हैं। स्पेसक्राफ्ट को पहले भारी कम्पन और फिर चार जेट विमानों के बराबर ध्वनि पर परखा जाएगा।
जीवन की संभावना तलाशेगा : इसरो के परियोजना प्रमुख डॉ. अन्ना दुराई ने बताया कि चंद्रयान चंद्रमा पर जीवन की संभावनाएँ भी तलाशेगा। हालाँकि तकनीकी परेशानियों के चलते यह चंद्रमा की सतह पर उतर नहीं सकेगा, लेकिन उसके आसपास मँडराएगा। इससे भी कई अहम जानकारी हासिल होगी।
चंद्रयान-2 को भी हरी झंडी : इधर, चंद्रयान-1 के बारे में जानकारी दी जा रही थी और उधर सरकार चंद्रयान-2 को हरी झंडी देने में लगी थी। कल कैबिनेट ने इस आशय का फैसला लिया। इस योजना पर 425 करोड़ रुपए का खर्च आएगा।
देश की सचाई : भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को देखकर लगता है कि यहाँ नागरिकों की मूलभूत जरूरतें पूरी चुकी हैं और देश आंतरिक तौर पर किसी बड़ी परेशानी से नहीं जूझ रहा है, लेकिन ऐसा नहीं है। देश पर कई विपदाएँ मँडरा रही हैं, जिनका हल पहले खोजा जाना चाहिए।
हाल ही में बिहार में अब तक की सबसे भीषण बाढ़ ने कहर बरपाया है। 20 लाख से अधिक लोग बेखर हो चुके हैं। 1000 करोड़ रुपए से अधिक की राशि भी कम लग रही है। इस प्राकृतिक आघात के निशान शायद बिहार के मानचित्र से मिट ही न पाएँ।
अब सौराष्ट्र जैसे दूसरे क्षेत्रों में बाढ़ का पानी भरता जा रहा है। बेबस किसानों को इसका सबसे अधिक खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। बताते हैं कि असम में बाढ़ का खतरा बना हुआ है।
आतंकवाद को सरकार रोक नहीं पा रही है। आतंकियों के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि वे पहले से घोषणा कर धमाके कर रहे हैं। हर बार सरकार का रवैया वही रहा है...जाँच की जाएगी, कुछ लोगों को गिरफ्तार किया जाएगा, मुकदमा चलेगा, लेकिन फैसला कुछ नहीं हो पाएगा। लाखों लोगों की जिंदगी आतंकवाद के चलते नर्क हो गई है।
प्राथमिकता क्या है?
सरकार भले ही ‘मिशन मून’ को लेकर अपनी पीठ थपथपाए, लेकिन सवाल उठाए जा रहे हैं कि उसकी प्राथमिकता क्या है...नागरिकों की परेशानियाँ दूर करना, भूखों को रोटी खिलाना, आतंकियों को रोकना या चाँद पर जीवन की तलाश करना? जहाँ जीवन है, उसकी परवाह नहीं की जा रही है।
जरूरी है, मगर... : माना कि देश के विकास में अंतरिक्ष यान प्रक्षेपण का भी बड़ा हाथ होता है। इससे जाहिर होता है कि देश तकनीक के मामले में भी दूसरे देशों की बराबरी कर रहा है।
इसरो ने कल चंद्रयान-1 के दीदार देश को कराए। इसरो इस पर लंबे समय से काम कर रहा था और यह उसकी महती योजना का हिस्सा था। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जब पहली बार इस योजना का खुलासा किया था, तब विश्व बिरादरी को भरोसा नहीं था कि भारत ऐसा कर पाएगा, लेकिन आखिर हम उस मुकाम पर पहुँच ही गए, जहाँ से देश अपना पहला चंद्रयान भेजेगा।
पीएसएलवी (पोलर सैटेलाइट लॉन्च वीइकल) चंद्रयान को लेकर अंतरिक्ष की उड़ान भरेगा। इसकी तिथि तय नहीं की गई है, लेकिन 22 से 26 अक्टूबर के बीच इसे छोड़ा जाएगा।
आधुनिकता की मिसाल : चंद्रमा के बारे में जानकारियाँ जुटाने के लिए चंद्रयान में उच्च तकनीक वाले यंत्र मौजूद हैं। इसके प्रक्षेपण के उद्देश्यों के बारे में जानकारी देते हुए इसरो के सैटेलाइट केंद्र के निदेशक डॉ. टीके एलेक्स ने बताया कि यह चंद्रमा के बनने की प्रक्रिया के बारे अहम जानकारी भेजेगा।
इसके माध्यम से चंद्रमा की सतह पर प्रयोग भी किए जाएँगे। यह दो साल के दौरान चाँद की सतह का पूरा नक्शा भेजेगा।
परीक्षण अभी बाकी : बहरहाल, चंद्रयान को अभी-भी कुछ अहम परीक्षणों से गुजरना है। बेंगलुरु में यह जाँच की जाएगी। सफल रहने पर ही इसका प्रक्षेपण घोषित तिथि को हो सकेगा, वरना 5 महीने देरी से पूरी हुई यह योजना कुछ और समय ले सकती है।
इसरो के वैज्ञानिकों ने बताया है कि कम्पन और ध्वनि को लेकर चंद्रयान के अहम टेस्ट अभी बाकी हैं। स्पेसक्राफ्ट को पहले भारी कम्पन और फिर चार जेट विमानों के बराबर ध्वनि पर परखा जाएगा।
जीवन की संभावना तलाशेगा : इसरो के परियोजना प्रमुख डॉ. अन्ना दुराई ने बताया कि चंद्रयान चंद्रमा पर जीवन की संभावनाएँ भी तलाशेगा। हालाँकि तकनीकी परेशानियों के चलते यह चंद्रमा की सतह पर उतर नहीं सकेगा, लेकिन उसके आसपास मँडराएगा। इससे भी कई अहम जानकारी हासिल होगी।
चंद्रयान-2 को भी हरी झंडी : इधर, चंद्रयान-1 के बारे में जानकारी दी जा रही थी और उधर सरकार चंद्रयान-2 को हरी झंडी देने में लगी थी। कल कैबिनेट ने इस आशय का फैसला लिया। इस योजना पर 425 करोड़ रुपए का खर्च आएगा।
देश की सचाई : भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को देखकर लगता है कि यहाँ नागरिकों की मूलभूत जरूरतें पूरी चुकी हैं और देश आंतरिक तौर पर किसी बड़ी परेशानी से नहीं जूझ रहा है, लेकिन ऐसा नहीं है। देश पर कई विपदाएँ मँडरा रही हैं, जिनका हल पहले खोजा जाना चाहिए।
हाल ही में बिहार में अब तक की सबसे भीषण बाढ़ ने कहर बरपाया है। 20 लाख से अधिक लोग बेखर हो चुके हैं। 1000 करोड़ रुपए से अधिक की राशि भी कम लग रही है। इस प्राकृतिक आघात के निशान शायद बिहार के मानचित्र से मिट ही न पाएँ।
अब सौराष्ट्र जैसे दूसरे क्षेत्रों में बाढ़ का पानी भरता जा रहा है। बेबस किसानों को इसका सबसे अधिक खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। बताते हैं कि असम में बाढ़ का खतरा बना हुआ है।
आतंकवाद को सरकार रोक नहीं पा रही है। आतंकियों के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि वे पहले से घोषणा कर धमाके कर रहे हैं। हर बार सरकार का रवैया वही रहा है...जाँच की जाएगी, कुछ लोगों को गिरफ्तार किया जाएगा, मुकदमा चलेगा, लेकिन फैसला कुछ नहीं हो पाएगा। लाखों लोगों की जिंदगी आतंकवाद के चलते नर्क हो गई है।
प्राथमिकता क्या है?
सरकार भले ही ‘मिशन मून’ को लेकर अपनी पीठ थपथपाए, लेकिन सवाल उठाए जा रहे हैं कि उसकी प्राथमिकता क्या है...नागरिकों की परेशानियाँ दूर करना, भूखों को रोटी खिलाना, आतंकियों को रोकना या चाँद पर जीवन की तलाश करना? जहाँ जीवन है, उसकी परवाह नहीं की जा रही है।
Tuesday, September 9, 2008
शर्म हमें शायद अब भी नहीं आएगी
एक बार फिर हाजि़र हैं, नागेन्द्र अपनी पैनी निगाह और मामूली से अल्फाज के साथ, मामूली से लोगों की बेहाल जिंदगी बयान करने के लिए। ऐसी बेदर्दी, ऐसी हैवानियत... उफ्फ... संकट की घड़ी में ऐसा सुलूक... सच है, शर्म वाकई में मगर हमें/इनको नहीं आएगी। इन्हें आप किन अल्फाज़ से नवाज़ेंगे। इनके लिए आप किस सजा की तजवीज करेंगे। ये शब्दों से ऊपर हैं और सजा तो शायद इनके लिए है ही नहीं। हिन्दुस्तान, भागलपुर के स्थानीय सम्पादक नागेन्द्र (Nagendra) की यह रिपोर्ट। हिन्दुस्तान से शुक्रिया के साथ।
शर्म हमें शायद अब भी नहीं आएगी
बाढ़ग्रस्त इलाकों की चिकित्सा व्यवस्था में छेद ही छेद हैं
सुपौल और सहरसा से लौटकर नागेन्द्र
बिहार के बाढ़ग्रस्त इलाकों में सरकारी चिकित्सा इंतजामों की बार-बार ढँकी जा रही परत खोलने के लिए त्रिवेणीगंज की यह घटना पर्याप्त है। पिछले पाँच दिनों में वहाँ जो कुछ हुआ उससे आक्रांत लोग अब रेफरल अस्पताल छोड़ कर भागने लगे हैं। लिखते हुए भी शर्म आती है लेकिन यह सच बहुत क्रूर है।
एक गर्भवती महिला वहाँ लाई गई। हालत बिगड़ी। उसका बच्च गर्भ में ही मर चुका था। आधा बाहर आ चुका था। कई दिन इसी हाल में पड़ा रहा। मचहा गाँव की इस महिला का हाल देख रेफरल अस्पताल के डाक्टरों ने इसे सहरसा जने की सलाह दी। वहाँ कोई भर्ती करने को तैयार नहीं हुआ। उसे फिर त्रिवेणीगंज ले गए जहाँ वह रविवार तक इसी हाल में पड़ी थी। बदबू भी आने लगी तो डाक्टरों ने अपना आउटडोर खुले मैदान में लगा लिया लेकिन उसकी ओर नहीं देखा। ‘हिन्दुस्तान’ में खबर छपी तो सब सक्रिय हुए। उसे फिर सुपौल भेजा गया। अभी शाम को (सोमवार) खबर आई है कि चिकित्सा तंत्र की संवेदनहीनता का शिकार हुई यह महिला फिर सहरसा पहुँचा दी गई थी जहाँ उसने दम तोड़ दिया है।
बाढ़ग्रस्त इलाकों में चिकित्सा सुविधाओं पर आश्वस्त होने वाले सरकारी तंत्र के लिए यह एक सूचना ही शायद काफी होगी अपनी पीठ थपथपाने की परिपाटी पर शर्म करने के लिए।
बिहार में बाढ़ की विभीषिका के बीच की गई चिकित्सा व्यवस्थाओं का जमीनी सच तो यही है लेकिन पता नहीं वह कौन सा नामालूम तंत्र और पद्धति है जिसके जरिए मानीटरिंग करने वाले सरकारी लोग भी वहाँ से संतुष्ट होकर लौट रहे हैं। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की उच्चस्तरीय टीम ने सहरसा के राहत शिविरों का निरीक्षण कर दवाओं की उपलब्धता और स्वच्छता पर संतोष व्यक्त किया है (यह खबर आज ही छपी है)। यह हतप्रभ करने वाला है।
दरअसल केन्द्रीय हो या राज्य की मानिटरिंग टीम, तरीका तो सब का सरकारी ही है। जिला मुख्यालय के सर्किट हाउसों में बैठकर या जीप से मुआयना करने से पूरा सच सामने नहीं आता। इसके लिए भीतर के उन स्थानों तक पहुँचने की जरूरत है जहां असल संकट है। रंगीन बत्ती लगी टाटा सफारी में बैठे एक बड़े अफसर जिस तरह सहरसा में शनिवार को मातहतों से रिपोर्ट ले रहे थे ‘व्यवस्थाओं पर संतुष्टि का यह सर्टिफिकेट’ शायद इसी पद्धति की देन है। उन्हें यह सच पता ही नहीं चल पाता (या शायद वे जनना नहीं चाहते) कि दूरदराज इलाकों से लोग अब भी अपने ही तरीके से, अपने संसाधनों से अपना इलाज कर रहे हैं।
सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, अररिया टाउन ही नहीं टेढ़े-मेढ़े, टूट कर किसी तरह बने रास्तों का लंबा सफर तय कर काफी अंदर बसे नरपतगंज (अररिया), त्रिवेणीगंज (सुपौल), भंगहा (पूर्णिया-मधेपुरा सीमा पर) और सिंहेश्वर (मधेपुरा) में चिकित्सा व्यवस्था का ऐसा ही नजारा दिखाई देता है। बाढ़ की विभीषिका से अंदर तक टूट चुके इन इलाकों में राजनीतिक दलों या उनसे जुड़े संगठनों के राहत शिविरों की तो भरमार है और चटखदार भोजन खिलाने की होड़ भी लेकिन एक भी शिविर ऐसा नहीं जहाँ दवा और डाक्टर का समुचित इंतजाम हो। चिकित्सा देने वाले ऐसे शिविर या तो गैर सरकारी संगठन चला रहे हैं या फिर सेना और अर्धसैनिक बल। सरकारी मेडिकल शिविर हैं लेकिन इनकी रफ्तार वही बेढंगी। संख्या भी काफी कम है।
त्रिवेणीगंज प्रखंड के भुतहीपुल की मुरलीगंज ५४ संख्या नहर पर एक छोटा-मोटा कस्बा बसा दिखाई देता है। इसे सेना और सीआईएसएफ की नेशनल डिजास्टर रेस्पांस फोर्स (एनडीआरएफ) ने बसाया है। वे लोगों को अब भी दूर-दराज से बचाकर ला रहे हैं, उन्हें भोजन करा रहे हैं, सुरक्षित शिविरों तक पहुँचा रहे हैं। इसी नहर पर उनका मेडिकल कैम्प भी है। सारी सुविधाओं के साथ। सेना का डाक्टर मरीजों को देखता है और जवान उन्हें दवा देते हैं। आधा मर्ज तो इन जवानों के प्यार से ही खत्म हो जता है।
इसी कैम्प के साथ एक और भी शिविर है। वहाँ अचानक डाँट-डपट की आवाज आती है। बचाकर लाए गए लोग हैं जो कुछ कहना चाहते हैं। उन्हें डपट दिया जता है। हम समङा जते हैं कि यह कोई ‘छोटे कद’ का ‘बड़ा’ सरकारी अफसर है। पता चला यह बिहार सरकार का शिविर है जो लोगों को सहायता देने के लिए लगाया गया है। चिकित्सा सहायता देने वाले शिविर यूँ भी कम हैं, लेकिन ऐसे में ऐसा व्यवहार लोगों की पीड़ा बढ़ा देता है।
एनडीआरएफ के सूबेदार टी गंगना कहते हैं, ‘हम तो मरीज देखते हैं। दवा तो सरकार को देनी है। वह बहुत कम है। न्यूट्रीशन के लिए तो कुछ है ही नहीं। नवजात के लिए भी कुछ नहीं। प्रापर न्यूट्रीशन न मिला तो जच्चा-बच्चा कैसे जियेगा।’ गंगना सूनामी के बाद थाइलैण्ड में भी काम कर चुके हैं। कई और देशों में भी। बोले ‘ऐसी सरकारी उपेक्षा कहीं नहीं देखी। अपने देश में भी ऐसा खराब अनुभव कहीं नहीं हुआ।’
हाँ, यूनीसेफ के लोग जहाँ-तहाँ दवाइयाँ और टेंट बाँटते दिखाई दे जाते हैं। उनके टेंट ऐसे हैं जिनमें सुरक्षित प्रसव की भी व्यवस्था है। वे बड़ा काम, पूरी खामोशी से कर रहे हैं।
शर्म हमें शायद अब भी नहीं आएगी
बाढ़ग्रस्त इलाकों की चिकित्सा व्यवस्था में छेद ही छेद हैं
सुपौल और सहरसा से लौटकर नागेन्द्र
बिहार के बाढ़ग्रस्त इलाकों में सरकारी चिकित्सा इंतजामों की बार-बार ढँकी जा रही परत खोलने के लिए त्रिवेणीगंज की यह घटना पर्याप्त है। पिछले पाँच दिनों में वहाँ जो कुछ हुआ उससे आक्रांत लोग अब रेफरल अस्पताल छोड़ कर भागने लगे हैं। लिखते हुए भी शर्म आती है लेकिन यह सच बहुत क्रूर है।
एक गर्भवती महिला वहाँ लाई गई। हालत बिगड़ी। उसका बच्च गर्भ में ही मर चुका था। आधा बाहर आ चुका था। कई दिन इसी हाल में पड़ा रहा। मचहा गाँव की इस महिला का हाल देख रेफरल अस्पताल के डाक्टरों ने इसे सहरसा जने की सलाह दी। वहाँ कोई भर्ती करने को तैयार नहीं हुआ। उसे फिर त्रिवेणीगंज ले गए जहाँ वह रविवार तक इसी हाल में पड़ी थी। बदबू भी आने लगी तो डाक्टरों ने अपना आउटडोर खुले मैदान में लगा लिया लेकिन उसकी ओर नहीं देखा। ‘हिन्दुस्तान’ में खबर छपी तो सब सक्रिय हुए। उसे फिर सुपौल भेजा गया। अभी शाम को (सोमवार) खबर आई है कि चिकित्सा तंत्र की संवेदनहीनता का शिकार हुई यह महिला फिर सहरसा पहुँचा दी गई थी जहाँ उसने दम तोड़ दिया है।
बाढ़ग्रस्त इलाकों में चिकित्सा सुविधाओं पर आश्वस्त होने वाले सरकारी तंत्र के लिए यह एक सूचना ही शायद काफी होगी अपनी पीठ थपथपाने की परिपाटी पर शर्म करने के लिए।
बिहार में बाढ़ की विभीषिका के बीच की गई चिकित्सा व्यवस्थाओं का जमीनी सच तो यही है लेकिन पता नहीं वह कौन सा नामालूम तंत्र और पद्धति है जिसके जरिए मानीटरिंग करने वाले सरकारी लोग भी वहाँ से संतुष्ट होकर लौट रहे हैं। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की उच्चस्तरीय टीम ने सहरसा के राहत शिविरों का निरीक्षण कर दवाओं की उपलब्धता और स्वच्छता पर संतोष व्यक्त किया है (यह खबर आज ही छपी है)। यह हतप्रभ करने वाला है।
दरअसल केन्द्रीय हो या राज्य की मानिटरिंग टीम, तरीका तो सब का सरकारी ही है। जिला मुख्यालय के सर्किट हाउसों में बैठकर या जीप से मुआयना करने से पूरा सच सामने नहीं आता। इसके लिए भीतर के उन स्थानों तक पहुँचने की जरूरत है जहां असल संकट है। रंगीन बत्ती लगी टाटा सफारी में बैठे एक बड़े अफसर जिस तरह सहरसा में शनिवार को मातहतों से रिपोर्ट ले रहे थे ‘व्यवस्थाओं पर संतुष्टि का यह सर्टिफिकेट’ शायद इसी पद्धति की देन है। उन्हें यह सच पता ही नहीं चल पाता (या शायद वे जनना नहीं चाहते) कि दूरदराज इलाकों से लोग अब भी अपने ही तरीके से, अपने संसाधनों से अपना इलाज कर रहे हैं।
सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, अररिया टाउन ही नहीं टेढ़े-मेढ़े, टूट कर किसी तरह बने रास्तों का लंबा सफर तय कर काफी अंदर बसे नरपतगंज (अररिया), त्रिवेणीगंज (सुपौल), भंगहा (पूर्णिया-मधेपुरा सीमा पर) और सिंहेश्वर (मधेपुरा) में चिकित्सा व्यवस्था का ऐसा ही नजारा दिखाई देता है। बाढ़ की विभीषिका से अंदर तक टूट चुके इन इलाकों में राजनीतिक दलों या उनसे जुड़े संगठनों के राहत शिविरों की तो भरमार है और चटखदार भोजन खिलाने की होड़ भी लेकिन एक भी शिविर ऐसा नहीं जहाँ दवा और डाक्टर का समुचित इंतजाम हो। चिकित्सा देने वाले ऐसे शिविर या तो गैर सरकारी संगठन चला रहे हैं या फिर सेना और अर्धसैनिक बल। सरकारी मेडिकल शिविर हैं लेकिन इनकी रफ्तार वही बेढंगी। संख्या भी काफी कम है।
त्रिवेणीगंज प्रखंड के भुतहीपुल की मुरलीगंज ५४ संख्या नहर पर एक छोटा-मोटा कस्बा बसा दिखाई देता है। इसे सेना और सीआईएसएफ की नेशनल डिजास्टर रेस्पांस फोर्स (एनडीआरएफ) ने बसाया है। वे लोगों को अब भी दूर-दराज से बचाकर ला रहे हैं, उन्हें भोजन करा रहे हैं, सुरक्षित शिविरों तक पहुँचा रहे हैं। इसी नहर पर उनका मेडिकल कैम्प भी है। सारी सुविधाओं के साथ। सेना का डाक्टर मरीजों को देखता है और जवान उन्हें दवा देते हैं। आधा मर्ज तो इन जवानों के प्यार से ही खत्म हो जता है।
इसी कैम्प के साथ एक और भी शिविर है। वहाँ अचानक डाँट-डपट की आवाज आती है। बचाकर लाए गए लोग हैं जो कुछ कहना चाहते हैं। उन्हें डपट दिया जता है। हम समङा जते हैं कि यह कोई ‘छोटे कद’ का ‘बड़ा’ सरकारी अफसर है। पता चला यह बिहार सरकार का शिविर है जो लोगों को सहायता देने के लिए लगाया गया है। चिकित्सा सहायता देने वाले शिविर यूँ भी कम हैं, लेकिन ऐसे में ऐसा व्यवहार लोगों की पीड़ा बढ़ा देता है।
एनडीआरएफ के सूबेदार टी गंगना कहते हैं, ‘हम तो मरीज देखते हैं। दवा तो सरकार को देनी है। वह बहुत कम है। न्यूट्रीशन के लिए तो कुछ है ही नहीं। नवजात के लिए भी कुछ नहीं। प्रापर न्यूट्रीशन न मिला तो जच्चा-बच्चा कैसे जियेगा।’ गंगना सूनामी के बाद थाइलैण्ड में भी काम कर चुके हैं। कई और देशों में भी। बोले ‘ऐसी सरकारी उपेक्षा कहीं नहीं देखी। अपने देश में भी ऐसा खराब अनुभव कहीं नहीं हुआ।’
हाँ, यूनीसेफ के लोग जहाँ-तहाँ दवाइयाँ और टेंट बाँटते दिखाई दे जाते हैं। उनके टेंट ऐसे हैं जिनमें सुरक्षित प्रसव की भी व्यवस्था है। वे बड़ा काम, पूरी खामोशी से कर रहे हैं।
Saturday, August 30, 2008
बशीर बद्र की ग़ज़लें/नज़में
कभी यूँ भी आ मेरी आँख में के मेरी नज़र को ख़बर न हो
मुझे एक रात नवाज़ दे मगर उसके बाद सहर न हो
वो बड़ा रहीम-ओ-करीम है मुझे ये सिफ़त भी अता करे
तुझे भूलने की दुआ करूँ तो दुआ में मेरी असर न हो
मेरे बाज़ुओं में थकी थकी , अभी महव-ए-ख़्वाब है चाँदनी
न उठे सितारों की पालकी, अभी आहटों का गुज़र न हो
ये ग़ज़ल कि जैसे हिरन की आँखों में पिछली रात की चाँदनी
न बुझे ख़राबे की रोशनी, कभी बेचराग़ ये घर न हो
वो फ़िराक़ हो या विसाल हो, तेरी याद महकेगी एक दिन
वो गुलाब बनके खिलेगा क्या, जो चिराग़ बनके जला न हो
कभी धूप दे, कभी बदलियाँ, दिल-ओ-जाँ से दोनों क़ुबूल हैं
मगर उस नगर में न क़ैद कर जहाँ ज़िन्दगी की हवा न हो
कभी दिन की धूप में झूम के कभी शब के फूल को चूम के
यूँ ही साथ साथ चलें सदा कभी ख़त्म अपना सफ़र न हो
मेरे पास मेरे हबीब आ ज़रा और दिल के क़रीब आ
तुझे धड़कनों में बसा लूँ मैं के बिछड़ने का कभी डर न हो
**********************************************
कहाँ आँसूओं की ये सौग़ात होगी
नये लोग होंगे नई बात होगी
मैं हर हाल में मुस्कुराता रहूँगा
तुम्हारी मुहब्बत अगर साथ होगी
चराग़ों को आँखों से महफ़ूस रखना
बड़ी दूर तक रात ही रात होगी
मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पे फिर मुलाक़ात होगी
******************************
कहीं चाँद राहों में खो गया कहीं चाँदनी भी भटक गई
मैं चराग़ वो भी बुझा हुआ मेरी रात कैसे चमक गई
मेरी दास्ताँ का उरूज था तेरी नर्म पलकों की छाँव में
मेरे साथ था तुझे जागना तेरी आँख कैसे झपक गई
कभी हम मिले तो भी क्या मिले वही दूरियाँ वही फ़ासले
न कभी हमारे क़दम बढ़े न कभी तुम्हारी झिझक गई
तुझे भूल जाने की कोशिशें कभी क़ामयाब न हो सकीं
तेरी याद शाख़-ए-गुलाब है जो हवा चली तो लचक गई
***************************************
कौन आया रास्ते में आईना ख़ाने हो गए
रात रौशन हो गैइ दिन भी सुहाने हो गए
क्यों हवेली के उजड़ने का मुझे अफ़सोस हो
सैकड़ों बेघर परिंदों के ठिकाने हो गए
ये भी मुम्किन है के उसने मुझको पहचाना न हो
अब उसे देखे हुए कितने ज़माने हो गए
जाओ उन कमरों के आईने उठाकर फेंक दो
वे अगर ये कह रहें हो हम पुराने हो गए
मेरी पलकों पर ये आँसू प्यार की तौहीन है
उनकी आँखों से गिरे मोती के दाने हो गए
*******************************
ख़ुदा हमको ऐसी ख़ुदाई न दे
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे
ख़तावार समझेगी दुनिया तुझे
अब इतनी भी ज़्यादा सफ़ाई न दे
हँसो आज इतना कि इस शोर में
सदा सिसकियों की सुनाई न दे
अभी तो बदन में लहू है बहुत
कलम छीन ले रौशनाई न दे
मुझे अपनी चादर से यूँ ढाँप लो
ज़मीं आसमाँ कुछ दिखाई न दे
ग़ुलामी को बरकत समझने लगें
असीरों को ऐसी रिहाई न दे
मुझे ऐसी जन्नत नहीं चाहिये
जहां से मदीना दिखाई न दे
मैं अश्कों से नाम-ए-मुहम्मद लिखूँ
क़लम छीन ले रौशनी न दे
अभी तो बदन में लहू है बहुत
क़लम छीन ले रोशनाई न दे
ख़ुदा ऐसे इरफ़ान का नाम है
रहे सामने और दिखाई न दे
मुझे एक रात नवाज़ दे मगर उसके बाद सहर न हो
वो बड़ा रहीम-ओ-करीम है मुझे ये सिफ़त भी अता करे
तुझे भूलने की दुआ करूँ तो दुआ में मेरी असर न हो
मेरे बाज़ुओं में थकी थकी , अभी महव-ए-ख़्वाब है चाँदनी
न उठे सितारों की पालकी, अभी आहटों का गुज़र न हो
ये ग़ज़ल कि जैसे हिरन की आँखों में पिछली रात की चाँदनी
न बुझे ख़राबे की रोशनी, कभी बेचराग़ ये घर न हो
वो फ़िराक़ हो या विसाल हो, तेरी याद महकेगी एक दिन
वो गुलाब बनके खिलेगा क्या, जो चिराग़ बनके जला न हो
कभी धूप दे, कभी बदलियाँ, दिल-ओ-जाँ से दोनों क़ुबूल हैं
मगर उस नगर में न क़ैद कर जहाँ ज़िन्दगी की हवा न हो
कभी दिन की धूप में झूम के कभी शब के फूल को चूम के
यूँ ही साथ साथ चलें सदा कभी ख़त्म अपना सफ़र न हो
मेरे पास मेरे हबीब आ ज़रा और दिल के क़रीब आ
तुझे धड़कनों में बसा लूँ मैं के बिछड़ने का कभी डर न हो
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कहाँ आँसूओं की ये सौग़ात होगी
नये लोग होंगे नई बात होगी
मैं हर हाल में मुस्कुराता रहूँगा
तुम्हारी मुहब्बत अगर साथ होगी
चराग़ों को आँखों से महफ़ूस रखना
बड़ी दूर तक रात ही रात होगी
मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पे फिर मुलाक़ात होगी
******************************
कहीं चाँद राहों में खो गया कहीं चाँदनी भी भटक गई
मैं चराग़ वो भी बुझा हुआ मेरी रात कैसे चमक गई
मेरी दास्ताँ का उरूज था तेरी नर्म पलकों की छाँव में
मेरे साथ था तुझे जागना तेरी आँख कैसे झपक गई
कभी हम मिले तो भी क्या मिले वही दूरियाँ वही फ़ासले
न कभी हमारे क़दम बढ़े न कभी तुम्हारी झिझक गई
तुझे भूल जाने की कोशिशें कभी क़ामयाब न हो सकीं
तेरी याद शाख़-ए-गुलाब है जो हवा चली तो लचक गई
***************************************
कौन आया रास्ते में आईना ख़ाने हो गए
रात रौशन हो गैइ दिन भी सुहाने हो गए
क्यों हवेली के उजड़ने का मुझे अफ़सोस हो
सैकड़ों बेघर परिंदों के ठिकाने हो गए
ये भी मुम्किन है के उसने मुझको पहचाना न हो
अब उसे देखे हुए कितने ज़माने हो गए
जाओ उन कमरों के आईने उठाकर फेंक दो
वे अगर ये कह रहें हो हम पुराने हो गए
मेरी पलकों पर ये आँसू प्यार की तौहीन है
उनकी आँखों से गिरे मोती के दाने हो गए
*******************************
ख़ुदा हमको ऐसी ख़ुदाई न दे
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे
ख़तावार समझेगी दुनिया तुझे
अब इतनी भी ज़्यादा सफ़ाई न दे
हँसो आज इतना कि इस शोर में
सदा सिसकियों की सुनाई न दे
अभी तो बदन में लहू है बहुत
कलम छीन ले रौशनाई न दे
मुझे अपनी चादर से यूँ ढाँप लो
ज़मीं आसमाँ कुछ दिखाई न दे
ग़ुलामी को बरकत समझने लगें
असीरों को ऐसी रिहाई न दे
मुझे ऐसी जन्नत नहीं चाहिये
जहां से मदीना दिखाई न दे
मैं अश्कों से नाम-ए-मुहम्मद लिखूँ
क़लम छीन ले रौशनी न दे
अभी तो बदन में लहू है बहुत
क़लम छीन ले रोशनाई न दे
ख़ुदा ऐसे इरफ़ान का नाम है
रहे सामने और दिखाई न दे
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